डर
डर डर हमारी ज़िन्दगी का एक ऐसा पहलू है जो हमारे ना चाहते हुए भी हमारे साथ रहता है हर पल हर घड़ी । किसी को खोने का डर , किसी के लिए खुद को खोने का डर, हमने जैसा सोचा है वैसा होगा या नहीं , इस बात का डर । ये डर ही है जिसकी परिकल्पना से हम खुद की सीमाएं निर्धारित कर लेते है , खुद को बेड़ियों में बांध लेते है , जानते हुए भी कि हम ये चीज़े कर सकते है , पर लोग क्या कहेंगे के डर से पीछे हट जाते है। ये हमारे मन में चलने वाले द्वंद , ये हमारे समाज की रूढ़िवादी परंपराएं, हमारे डर को और मजबूती से हमारे दिल ओर दिमाग में जगह देती है । डर इंसान का सबसे बड़ा दुश्मन है , लड़का हो या लड़की उसे समाज का ,अपने परिवार की मान -मर्यादा का डर दिखा कर उसके सपनों के पंख तोड़ दिए जाते है , बचपन से हमें डर के साथ बड़ा किया जाता है ये मत करना , ऐसे मत बोलना ,ऐसे मत हँसना वरना लोग क्या कहेंगे ? कभी संस्कार के नाम पर, तो कभी भगवान के नाम पर बच्चो के अंदर डर का बीज़ बोया जाता है , उन्हें सही गलत ना सिखाते हुए बस इससे डरो सिखाया जाता है खुद पर विश्व...