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डर

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 डर  डर हमारी ज़िन्दगी का एक ऐसा पहलू है जो हमारे ना चाहते हुए भी हमारे साथ रहता है  हर पल हर घड़ी । किसी को खोने का डर ,  किसी के लिए खुद को खोने का डर, हमने जैसा सोचा है वैसा होगा या नहीं , इस बात का डर । ये डर ही है  जिसकी परिकल्पना से हम  खुद की सीमाएं निर्धारित कर लेते है , खुद को बेड़ियों में बांध लेते है , जानते हुए भी कि  हम ये चीज़े कर सकते है , पर लोग क्या कहेंगे के डर से पीछे हट जाते है। ये हमारे मन में चलने वाले  द्वंद , ये  हमारे समाज की रूढ़िवादी परंपराएं, हमारे डर को और मजबूती से हमारे दिल ओर दिमाग में जगह देती है । डर इंसान का सबसे बड़ा दुश्मन है ,  लड़का हो या लड़की उसे समाज का ,अपने परिवार की मान -मर्यादा  का डर दिखा कर उसके सपनों के पंख तोड़ दिए जाते है , बचपन से हमें डर के साथ बड़ा किया जाता है ये मत करना , ऐसे मत बोलना ,ऐसे मत हँसना  वरना लोग क्या कहेंगे ? कभी संस्कार के नाम पर, तो कभी भगवान के नाम पर बच्चो के अंदर डर का बीज़ बोया जाता है , उन्हें सही गलत ना सिखाते हुए बस इससे डरो सिखाया जाता है खुद पर विश्व...

किस्से...

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किस्से यूं तो किस्से हम सभी के पास होते है कुछ अच्छे, कुछ बुरे और कुछ ऐसे जिन्हें याद करके कई सालों बाद भी हम ठहाके मार के हंस सकते है । ऐसे जिनमें हमारा बचपना होता है और हम बस पुराने दिनों में खो जाते है । बात होगी २०१७ की , नवंबर का महीना होगा । मौसम में ठंड का दौर और कॉलेज में असाइनमेंट का दौर शुरू हो चुका था । एक दिन मै और मेरी दोस्त  दोनों देर रात तक असाइनमेंट बना रहे थे और मेरा बिल्कुल मन नहीं लग रहा था मेरे दिमाग में बस शरारतें आ रही थी । मैंने दोस्त से कहा चल हॉस्टल में किसी को परेशान करते है , शोर मचा कर भाग आते है २nd फ्लोर से , या फ्रिज में से सामान गायब कर देते है । पर मेरी दोस्त वो थोड़ी शांत थी उसे शरारतें उतनी पसंद नहीं  थी तो थोड़ी देर बाद हमने कमरे की लाइट बंद की और सोने लगे , वो सो गई पर मै लेटे - लेटे कुछ तूफानी करने का सोचने लगी ।  इतने में मैने देखा कमरे की खिड़की से हल्की हल्की रोशनी मेरी दोस्त के पलंग में आ रही थी और पास में ही टेबल पे चाकू पड़ा था , मेरी आंखो में जैसे चमक सी आ गई मैने फौरन अपने बाल खोले और चाकू हाथ में लेकर उसके उपर बैठ गई अब वो हल...