डर

 डर 

डर हमारी ज़िन्दगी का एक ऐसा पहलू है जो हमारे ना चाहते हुए भी हमारे साथ रहता है 

हर पल हर घड़ी ।

किसी को खोने का डर , 

किसी के लिए खुद को खोने का डर,

हमने जैसा सोचा है वैसा होगा या नहीं ,

इस बात का डर ।

ये डर ही है  जिसकी परिकल्पना से हम 

खुद की सीमाएं निर्धारित कर लेते है ,

खुद को बेड़ियों में बांध लेते है ,

जानते हुए भी कि  हम ये चीज़े कर सकते है ,

पर लोग क्या कहेंगे के डर से पीछे हट जाते है।

ये हमारे मन में चलने वाले  द्वंद ,

ये  हमारे समाज की रूढ़िवादी परंपराएं,

हमारे डर को और मजबूती से हमारे दिल ओर दिमाग में जगह देती है ।

डर इंसान का सबसे बड़ा दुश्मन है , 

लड़का हो या लड़की उसे समाज का ,अपने परिवार की मान -मर्यादा  का डर दिखा कर उसके सपनों के पंख तोड़ दिए जाते है ,

बचपन से हमें डर के साथ बड़ा किया जाता है ये मत करना , ऐसे मत बोलना ,ऐसे मत हँसना

 वरना लोग क्या कहेंगे ?

कभी संस्कार के नाम पर, तो कभी भगवान के नाम पर बच्चो के अंदर डर का बीज़ बोया जाता है , उन्हें सही गलत ना सिखाते हुए बस इससे डरो सिखाया जाता है खुद पर विश्वास करना नहीं ।

विश्वास डर का सबसे बड़ा दुश्मन है 

जिस  दिन आपने खुद पर विश्वास/ यकीन /भरोसा कर लिया कोई भी डर आपको छू नहीं सकता ।

अमूमन डर हर किसी के जीवन में होता है ,

पर जिसको खुद को पर विश्वास होता है ,

वो हर डर को हराकर , उन सीमायों को लांघ कर ऐसा कुछ कर जाता है जो उसे इतिहास में अमर कर देता है ।



Tread carefully

Comments

Popular posts from this blog

Mental Health

हरिशंकर परसाई के व्यंग की सार्थकता

किस्से...